डॉ. लाल रत्नाकर की कलाकृतियों
में सामाजिक न्याय की अक्काशी।
बी आर विप्लवी
(कथाकार,कवि,गीत और ग़ज़लकार के साथ सामाजिक विमर्श और भारत सरकार के रेल विभाग से सेवानिवृत अधिकारी)
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| बी आर विप्लवी |
रत्नाकर जी की कला का कोई जवाब नहीं है। उनकी तूलिका रंगों और आकृतियों के माध्यम से गूढ़ एवं जटिल विषय वस्तु को भी सरल बना कर व्याख्यायित करते हुए पेश करती है। किंतु उस सरलता में भी एक विशिष्ट तरह का इशारा छुपा होता है जिसे बारीक़ी से समझने और विश्लेषण करने की नज़र चाहिए होती है। उनके चित्रों के माध्यम से एक बहुत बड़े सामाजिक- वैचारिक विमर्श को नया आयाम मिलता है।
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| तृष्णा : आयल ऑन कैनवास |
उनके चित्रों में अक्सर ग्रामीण परिवेश अपनी पुरातन परिपाटी के साथ-साथ नवोन्मेषी भाव भंगिमा में नज़र आता है । उनकी यह कला अपने पुराने इतिहास की पृष्ठभूमि में वर्तमान परिस्थितियों को रूपायित करने के लिए एक सेतु का काम करती है। डॉ.लाल रत्नाकर ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने भारतीय ग्रामीण जीवन के सांस प्रस्वांस में जड़ीभूत वर्ण- व्यवस्था वाली घृणित जीवन शैली को शायद पहली बार चित्रों के ज़रिए जीवंत करते हुए देश और समाज से कुछ गहरे सवाल पूछे हैं--यथा मनुष्य मनुष्य में जन्मना भेद क्यों,तथा एक व्यक्ति जन्म के आधार पर किस प्रकार नीच तथा उच्च माना जाता है ? आखिर सारी योग्यताओं की कसौटी तथा मापदंड भारत में जाति ही क्यों है? क्या किसी के श्रम, कला, ज्ञान-विज्ञान तथा उसकी निर्माण कारी सोच एवं निर्मिति की इस देश के विकास में कोई अहमियत नहीं है?---आदि आदि। मेरी जानकारी में शायद यह पहली बार है कि ऐसे ज्वलंत तथा सास्वत प्रश्न पर किसी ने सवाल उठाया है। तथाकथित कुलीन मानसिकता वाले प्रच्छन्न जातीय दम्भ से परिपूर्ण मनीषियों- कलाकारों में अकेले पड़ जाने का जोख़िम उठाकर, हिम्मत से -सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध खड़े होने का जो काम उन्होंने किया है वह बहुत ही विरल है। मैं उनकी अद्भुत कला तथा उस में समाए हुए दलित-बहुजन जीवन से जुड़े तमाम पक्षों से अभिभूत हूं। उनकी नैतिक समझ और कुरीतियों से लोहा लेने की उनकी अदम्य क्षमता को यूं ही उत्तरोत्तर बढ़ते जाना होगा।
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| घसिहारिने : आयल ऑन कैनवास |
डॉ. लाल रत्नाकर के चित्रों में नारी जगत के चित्र बहुतायत में अपनी पूरी जीवंतता लेकर उभरे हैं । यह कोई अप्रत्याशित नहीं है तथा बहुत ही साफ़ कहा जा सकता है कि ग्रामीण समाज की पूरी अर्थव्यवस्था; विशेष रुप से दलित बहुजन समाज की,स्त्री के कंधों पर ही टिकी हुई है -- इसी बात को कलाकार बार-बार अपने चित्रों में लाता है-- चाहे वह खेत खलिहान का दृश्य हो, जुताई-बुवाई का दृश्य हो,पशुओं के साथ उनके तादात्म्य में तथा पालनकर्ता के रूप में लगाव का चित्र हो,या फिर घरों में ओखल-मूसल, आटा चक्कीपर गीतात्मक श्रमशीलता, सिलबट्टा के साथ, घसियारनें, पनिहारिनें, या गांव या खेतों में महिलाओं की आपसी गोष्ठी और दुखम सुखम के चित्र हों, वे अपने परिवेश के क्लाइमैक्स तथा माहौल को साथ लेकर उपस्थित होते हैं। चित्रों में उनकी भाव-भंगिमा, चितवन, हाथों के इशारे तथा उनके वेशभूषा ने चित्रों में जो कुछ अनकहा सा छुपा होता है-जो अपने आप बहुत सारी कथा-कहानियों को व्याख्यायित करता है ।यही नहीं बल्कि इन चित्रों में स्त्री की देह की प्राचीन भोगवादी और मनुवादी यौनिकिता से अलग हटकर उसके श्रम तथा कार्य व्यापार को प्रमुखता से अंकन किया गया है। यहां स्त्री कोई बाज़ारू वस्तु या 'उपयोग करो और फेंक दो' वाली वस्तु बनकर नहीं आती बल्कि वह समाज में अपनी पूरी दावेदारी के साथ आती है।
उनके कई चित्रों में तो स्त्री-चरित्र अपनी पूरी मालिकाना ठसक के साथ चारपाई पर या मचिया पर बैठी हुक्म चलाते सी नज़र आत हैं जो हमारी पुरानी मात्री प्रधान जीवन परंपरा की याद दिलाते हैं। इन चित्रों में स्त्री आगे आने वाली पीढ़ी की बहू-बेटियों को किस प्रकार नैतिकता एवं आचरण का पाठ भी अपने कार्य व्यापार मैंन शरीक़ करके ही सिखाती हैं जिससे जिंदगी का व्यावहारिक ज्ञान हासिल हो सके।
उनके कई चित्रों में तो स्त्री-चरित्र अपनी पूरी मालिकाना ठसक के साथ चारपाई पर या मचिया पर बैठी हुक्म चलाते सी नज़र आत हैं जो हमारी पुरानी मात्री प्रधान जीवन परंपरा की याद दिलाते हैं। इन चित्रों में स्त्री आगे आने वाली पीढ़ी की बहू-बेटियों को किस प्रकार नैतिकता एवं आचरण का पाठ भी अपने कार्य व्यापार मैंन शरीक़ करके ही सिखाती हैं जिससे जिंदगी का व्यावहारिक ज्ञान हासिल हो सके।
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| बुकवा : आयल ऑन कैनवास |
इस प्रकार हम देखें तो डॉ लाल रत्नाकर ने अपने चित्रों के माध्यम से स्त्री देह की सुंदरता का अक्स तो दिखा रहे हैैं लेकिन उस सुंदरता को प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करने का जो सुनहरा मौका वे सृजित कर देते हैं उससे इस सुंदरता की अर्थव्यवत्ता तथा उसकी प्रासंगिकता सिद्ध हो जाती है। इसी प्रकार वे अपने कई चित्रों में समाज के निचले वर्ग के कामगारों की मेहनत-मशक़्क़त भरी जिंदगी को भी वे अपने चित्रों में उतार देते हैैं । जैसे साफ़- सफ़ाई में लगे स्त्री-पुरुष झाड़ू लेकर अपने कार्य में किस प्रकारसेवा भावना से लगे हुए हैं तथा वहीं बैठा कोई धर्म का तथाकथित पंडा-पुरोहित अपनी माला-टीका-छाप तिलक,धोती-जनेऊ के लम्पट साज-सज्जा में अपनी शातिर नज़रों से किस प्रकार उन्हें देखता है - यह भी चित्र वहां मिलते हैं। यही नहीं बल्कि गांव- गिरांव में पूजा-पाठ, हवन-पूजन के नाम पर किस प्रकार ब्राह्मणवादी परंपरा लोगों को मानसिक गुलाम बनाकर उनका आर्थिक शोषण कर रही है- इसके विचित्र वहां बहुतायत से देखे जा सकते हैं। वास्तव में का डॉ.लाल रत्नाकर का एक-एक चित्र अपने आप में कथानक के साथ पूरा उपन्यास है, जिसके बारे में विस्तार से बात की जा सकती है ।
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| पाहुन : आयल कैनवास पर : श्री शरद यादव के संग्रह में |










1 टिप्पणी:
high class work.
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